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आरोपी लड़ सकेंगे चुनाव लेकिन जिन पर आरोप साबित हो चुके हैं/सजा हो चुकी है उनको नहीं कोई राहत : सुप्रीम कोर्ट

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चंडीगढ़ (तहलका खबर): 26.09.2018 

देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैंसले में कहा है की यदि किसी व्यक्ति के ऊपर आरोप निर्धारित हो चुके हैं लेकिन अभी सजा नही हुई, ऐसा व्यक्ति लोकसभा व् विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य करने का कानून सुप्रीम कोर्ट नहीं अपितु पार्लियामेंट बना सकती है और कोर्ट ने देश की संसद को इस बारे कानून बनाने को भी कहा !

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को बेहतर समझने के लिए हमारे संवाददाता ने सुप्रीम कोर्ट के वकील संजय कुमार से बातचीत की,  बातचीत के महत्पूर्ण अंश इस प्रकार है:-

सवाल: सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद क्या अपराध के आरोपी चुनाव लड़ सकते हैं ?

जवाब: केवल आरोप निर्धारित करने से व्यक्ति दोषी नहीं माना जाता, अपराध निर्धारित करने के बाद कोर्ट मुकद्दमा चलाती है जिसमे पुलिस को गवाहों के माध्यम से आरोप साबित करने होते है, केवल आरोपी है तो कानून में चुनाव न लड़ने सम्बन्धी कोई बाध्यता नहीं !

सवाल: दोष सिद्ध होने के बाद किस तरह की क़ानूनी अडचने है ?  

जवाब : यदि आरोपी दोषी साबित हो जाता है और उसे दो साल से ऊपर की सजा सुना दी गई हो तो वह लोक सभा या विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ सकता, भारतीय सविंधान व जनप्रतिनिधि कानून के तहत केवल वही व्यक्ति चुनाव लड़ने के लिए योग्य है जिसको कोर्ट ने सजा नहीं सुनाई, जिस व्यक्ति को कोर्ट सजा सुना चुकी है वह व्यक्ति जब तक सजा पूरी नही कर लेता और पूरी करने के बाद छह साल पूरे नहीं हो जाते तब तक लोकसभा या विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ सकता, यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ पुलिस ने आपराधिक मकद्द्में में चालान फ़ाइल कर दिया है और कोर्ट ने उस व्यक्ति पर आरोप निर्धारित करके केस चला दिया है तो ऐसा व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है क्योंकि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है  केवल सजा के बाद ही अयोग्य माना जाता है !

सवाल : यदि दोषी सिद्ध होने के बाद और सजा सुनाई जाने के बाद उपरी अदालत में अपील लंबित हो तो क्या ऐसी दशा में चुनाव लड़ सकते हैं !

जवाब : जी बिलकुल नहीं, अपील के लंबित होने का ये मतलब नहीं की व्यक्ति दोषी नहीं, निचली कोर्ट के सजा सुनाने के बाद एक व्यक्ति को दोषी माना जाता है केवल आरोपी नहीं, जब तक अपील मंजूर नहीं हो जाती और कोर्ट बरी नहीं कर देती तब तक चुनाव नहीं लड़ा जा सकता ! हाँ, दोषी सिद्ध होने से पहले,  बेशक कोई आरोपी हो, और केस अभी निचली अदालत यानी डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में लंबित हो चुनाव लड़ा जा सकता है !

सवाल : यदि कोर्ट ने अपील लंबित रहने के दौरान मुलजिम को जमानत या परोल दे दी हो तो क्या चुनाव लड़ा जा सकता है ?

जवाब: जी नहीं, जमानत देने के कई आधार होते हैं, लम्बे समय तक अपील लंबित रहने के दौरान किसी अपराधी को जेल में नहीं रख सकते, कोर्ट साधारणतया जमानत दे देती है लेकिन ऐसा व्यक्ति की सजा बरकरार रहती है यानी उसको जमानत के दौरान भी दोषी माना जाता है और वह चुनाव नहीं लड़ सकता ! केवल अपील मंजूर होने के बाद और बरी होने के बाद ही चुनाव लड़ सकता है !

सवाल : सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट के मुताबिक दो अक्तूबर को ओम प्रकाश चौटाला जेल से रिहा हो सकते हैं , यदि ऐसा होता है तो क्या वो चुनाव लड़ सकते हैं ?

जवाब: जी देखिये, सोशल मीडिया पर कही गई हर बात सत्य नहीं होती, मेरा निजी मानना है की वो एक अच्छे नेता है, जेल में उनका व्यवहार अच्छा है और उम्र के लिहाज से उन्हें रिहा कर देना चाहिए, जहाँ तक चुनाव लड़ने की बात है तो मैं कहूँगा की यदि हम मान भी ले की ओम प्रकाश चौटाला दो अक्तूबर को जेल से रिहा हो जाते है तब भी वह चुनाव नहीं लड़ सकते कयोंकि वो केवल आरोपी नहीं दोषी सिद्ध हो चुके हैं और रिहा होने के बाद कानून के मुताबिक वो छह साल तक चुनाव नहीं लड़ सकते !

सवाल: फिर से आपसे पूछेंगे की आरोपी और दोषी में क्या फर्क होता है ?

जवाब : वैसे तो मैं पहले बता चूका हूँ लेकिन आपने फिर से पूछा है तो बताना चाहूँगा की केस की कई स्टेज होती हैं पहले पुलिस ऍफ़ आई आर दर्ज करती है उसके बाद  ऍफ़ आई आर में लगे आरोपों की जांच की जाती है यदि पुलिस को जांच के दौरान आरोप झूठे लगते है तो पुलिस  ऍफ़ आई आर को रद्द करके कोर्ट में रिपोर्ट पेश करती है लेकिन यदि ऍफ़ आई आर में लगे आरोप पुलिस जांच में सच पाए जाते हैं तो पुलिस चालान /चार्जशीट यानी आरोप पत्र कोर्ट में पेश करती है और जिसके खिलाफ आरोप पत्र पेश होता है उसे आरोपी कहा जाता है उसके बाद कोर्ट चालान /चार्जशीट यानी आरोप पत्र पर विचार करती है और यदि कोर्ट को लगता है की आरोप पत्र में लागाये गए आरोप प्रथम दृष्टया से सही लगते हैं और कोर्ट यह तय करती है की किन-किन धाराओं के तहत केस चल सकता है, कोर्ट जिसके खिलाफ आरोप लगे हैं यानी आरोपी से पूछती है की क्या वह आरोपों को कबूल करते हैं या नहीं, सामान्यतः आरोपी आरोप कबूल नहीं करता तो ऐसी दशा में कोर्ट आरोप पत्र के मुताबिक केस को गवाही पर लगा देती है जिसमे पुलिस को सरकारी वकील की सहायता से, कोर्ट में गवाहों को पेश करना होता है और गवाही पूरी होने के बाद व् मुलजिम को अपने बचाव् में मौका देने के बाद कोर्ट निर्णय करती है की क्या आरोप सिद्ध होते हैं या नहीं, यदि कोर्ट दोषी करार देती है तो उसके बाद कितनी सजा दी जाए इस बात पर फैंसला होता है यदि आरोप साबित न हो तो कोर्ट बरी कर देती है ! इसलिए दोष सिद्ध होने से पहले एक व्यक्ति को केवल आरोपी की श्रेणी में रखा जाता है जिसको चुनाव लड़ने से नही रोका जा सकता, लेकिन यदि सजा हो जाए तो तुरंत प्रभाव से ऐसा ब्यक्ति लोकसभा या विधानसभा की सदस्यता के लिए अयोग्य माना जाता है !

सवाल : क्या आरोपी बारे किसी तरह का कानून बनने की सम्भावना है ?

जवाब: सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में साफ़ कहा है की कानून बनाना केवल संसद का काम है कोर्ट का नहीं, मोजुदा कानून में केवल सजा प्राप्त अपराधी ही चुनाव् लड़ने के लिए अयोग्य हैं इसलिए कोर्ट ने कहा है की आरोपीयो के सम्बन्ध में भी कानून बनाया जाए और यदि संसद कानून बनाती है तो आरोपी भी चुनाव नहीं लड़ पायेंगे !

सवाल: क्या राजनितिक  पार्टियों, चुनाव आयोग व्  नेताओं को भी कोर्ट ने किसी तरह की कोई हिदायत दी ?

जवाब : जी बिलकुल, कोर्ट ने कहा है की अपराधियों को चुनाव से दूर रखना एक मजबूत और साफ़ सुथरे लोकतंत्र के लिए जरुरी है हर वोटर को अपने उम्मीदवार के भूतकाल और वर्तमान के बारे में जानने का पूरा हक़ है, कोर्ट ने विशेषतः पांच हिदायते दी है जैसे की नॉमिनेशन फॉर्म में पूरा विवरण देने, अपराधिक केस बारे बड़े अक्षरों में लिखना, टिकट लेते वक्त पार्टी को अपने क्रिमिनल रिकार्ड बारे सूचित करना और राजनीतक दलों को कहा है की उम्मेदवार का क्रिमिनल रिकार्ड अपनी वेबसाइट पर डालें व् उम्दमीदवार और पार्टी क्रिमिनल रिकार्ड बारे जोर शोर से प्रचार करे, प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में कम से कम तीन बार क्रिमिनल रिकार्ड को प्रकाशित करे आदि !

धन्यवाद !”

सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय के बाद क्या भाजपा सरकार आरोपियों को चुनाव न लड़ने सम्बन्धी कानून संसद में लेकर आएगी जैसा की सजायाफ्ता अपराधियों के लिए है,  जैसे ट्रिपल तलाक पर लेकर कानून लेकर आई है, ये तो खैर भविष्य ही बतायेगा लेकिन यदि ऐसा कानून आता है तो इस बात की सम्भावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता की ऐसे कानून का किसी को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए दुरपयोग भी हो सकता है !

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